Advertisement

NATUROPATHY IS HELPFUL IN RECOVERING FROM TB

प्राकृतिक चिकित्सा ( Ayurvedic Tuberculosis Treatment in Hindi )

Tuberculosis – आमतौर पर टीबी को फेफड़े की बीमारी से जोड़ा जाता है, लेकिन टीबी हड्डियों, जोड़ो, गले, आंखों, स्किन कहीं भी हो सकती है | तपेदिक का मतलब होता है- पुराना संक्रमण यानी किसी को बहुत क्रॉनिक इंफेक्शन हो जाए, बस पड़ जाए, कीटाणु हो जाए, वह अंग खराब हो जाए | इस रोग के उपचार में प्राकृतिक चिकित्सा भी बहुत सहायक है |

फेफड़ों में टीबी जुकाम होने पर आमतौर पर दवाइयों से इसे दवा दिया जाता है या इग्नोर कर इलाज नहीं किया जाता है | कई बार या बिगड़ कर ब्रोंकल अस्थमा बनता है और फिर अस्थमा बन जाता है |

दमा का उपचार भी ठीक तरह से ना होने पर बलगम बरोंकल ट्यूब में फैल जाता है और उसमें कीटाणु पड़ जाते हैं | इससे फेफड़े का 40-50% हिस्सा काम नहीं करता | इससे फेफड़े का टीबी हो जाता है |

प्रमुख लक्षण ( tuberculosis symptoms in Hindi )

फेफड़ों के टीबी में मरीज के गले, छाती में जमा बलगम से सांस लेने में दिक्कत होती है, चलना फिरना मुश्किल हो जाता है, शरीर में दर्द, कमजोरी रहती है, वजन गिरने लगता है, बार बार बुखार आता है | स्थिति घातक भी हो जाती है |

कारण ( reason of Tuberculosis in Hindi )

टीबी होने का मुख्य कारण हाइजीन कमी है | दूसरा जागरूकता की कमी | आमतौर पर सर्दी-जुकाम, बुखार, बदन दर्द की अनदेखी की जाती है | डायग्नोज ठीक से ना हो पाने के कारण सही उपचार भी नहीं होता और इन्फेक्शन अंदर ही अंदर बढ़ता जाता है |

उपचार ( ayurvedic Tuberculosis treatment in Hindi )

प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में टीबी के उपचार के लिए सबसे पहले यह देखा जाता है कि टीबी किस स्टेज में है | इस आधार पर उपचार विधि व औषधि अपनाई जाती है |

सन बाथ और मद थेरेपी

मरीज को धूप में लिटा कर सन बाथ दिया जाता है | फिर हॉट मद थेरेपी दी जाती है |औषधी गुणों से भरपूर सूर्य की किरणों से चार्ज की गई मिट्टी ली जाती है, जिसमें लौंग, सोंठ, कपूर और दालचीनी को मिलाया जाता है | इस मिट्टी को कढ़ाई में हल्का गर्म करके माथे, पेट और छाती पर लगाकर, कंबल ओढ़ा कर कुछ लेटाया जाता है | इससे Tuberculosis का बुखार ठीक हो जाता है और आराम मिलता है |

शोधन क्रिया

अगर Tuberculosis प्रारंभिक अवस्था में है, तो इन्फेक्शन को दूर करने के लिए शोधन किर्या की जाती है | इसे डिटॉक्सिफिकेशन कहते हैं | इसके लिए कुंजल या जल नेती क्रिया करवाई जाती है |

इसमें नमकीन गुनगुना पानी एक तरफ की नाक से डालकर दूसरी तरफ से निकाला जाता है | इससे नाक की गंदगी साफ होती है | इसके अलावा वस्त्र पट्टी क्रिया के नियमित अभ्यास से सारा बलराम, पीठ और फेफड़े के अंदर की गंदगी धीरे-धीरे निकल जाती है | मरीज इसे ना कर पाए, तो उसे दिन में कई बार गुनगुना पानी पीने की सलाह दी जाती है |

स्टीम बाथ

मरीज को मुंह और नाक के माध्यम से स्टीम थेरेपी 5 से 15 मिनट तक दी जाती है | पतीले में पानी लेकर युक्लिप्तिस के पत्ते या युक्लीपिट्स ऑयल की 4-5 बूंदे नाक में डाली जाती है |

उसे 4 तरह से गहरी सांस के साथ स्टीम लेने के लिए कहा जाता है | इससे स्वसन तंत्र में मौजूद बलगम पिघलने लगती है और बह कर निकल जाती है | मरीज को सांस लेने में आसानी हो जाती है |

स्टीम थेरेपी बलगम में मौजूद इन्फेक्शन फैलाने वाले बैक्टीरिया का सफाया करने में भी मददगार है | इस प्रक्रिया से पुरानी सूखी खांसी, इन्फेक्शन दूर हो जाते हैं और बुखार ठीक हो जाता है | टीबी भी 1 से 3 महीने में जड़ से ठीक हो जाता है |

हाफ फुट बाथ

मरीज को स्टूल या तख्त पर बिठाकर गुनगुना पानी से भरे बड़े टैब में टखने से ऊपर पिंडली तक पानी में पैर डुबोने के लिए कहा जाता है | उसे सिर से पैरों तक एक बड़ी चादर से इस तरह ढका जाता है कि पूरे शरीर की भाप से सिकाई हो | हाफ फुट बाथ शरीर में ऊष्मा पैदा करता है और सर्दी जुकाम दूर करता है |

प्राणायाम

रोज प्राणायाम करने से खून की गंदगी, फेफड़े, पेट या शरीर की गंदगी सांस के माध्यम से धीरे-धीरे बाहर निकलती है | प्राणायाम से 5 से 10 गुना ज्यादा शुद्ध हवा ले पाते हैं और रक्त में भी ऑक्सीजन का स्तर बढ़ जाता है |

Post a comment

0 Comments